Friday, January 19, 2018

यारियां निभाने का वक़्त न मिला
दूरियां घटाने का वक़्त न मिला।
भाग दौड़ में ही गुज़र गई ज़िंदगी
ज़रा भी सुस्ताने का वक़्त न मिला।
सफर जो भी कटना था कट ही गया
सिलसिले बनाने का वक़्त न मिला।
ज़रा सी बात पर ही जो रूठ गए थे
फ़िर उन्हें मनाने को वक़्त न मिला।
जिससे जीते हार भी उसी से मान ली
हाले दिल सुनाने का वक़्त न मिला।
दिल की दीवार पर सीलन है ग़म की
कभी धूप दिखाने का वक़्त न मिला।
घुट कर रह जाएंगी ये तन्हाइयां मेरी
ख़ुद को ही रिझाने का वक़्त न मिला।
कुछ तो ऐसा हो कि मैं ज़िंदा रह सकूं
मुक़द्दर आज़माने का वक़्त न मिला।
इस दिल का क्या करे कोई
तड़पा करे कि दवा करे कोई
वो देखकर के आहें भरते हैं
कैसे अंगडाई लिया करे कोई
ऐसा क्या है चाँदनी में बता
चाँद को ही तरसा करे कोई
फुरसत कहां है किसी को
हर वक्त ही मिला करे कोई
क्या रखा है जिंदगी में भी
मर मर कर जिया करे कोई
जो बात चिकनी चुपड़ी हो
वो हमसे न किया करे कोई
हवा तो सांय सांय करती है
बेवजह नहीं सुना करे कोई
हर दुआ कबूल नहीं होती
इतनी भी न दुआ करे कोई

Monday, January 15, 2018

खुशबू अच्छी थी अध खिले गुलाब की
कहानी इतनी सी है बस मेरे शबाब की
नींद उड़ जाती थी जब निगाहों से मेरी
तन्हाईयों  में जरुरत पड़ती थी  ख़्वाब की
ढूंढती है दुनिया जिसे इश्क के बाजार में
जरुरत नहीं मुझे वफ़ा की उस किताब की
रिवायतों का कत्ल हो गया था कल रात में
आवाज़ें आ रही थी कहीं से इन्कलाब की
रास्ता बदल लेते हैं वो मुझको देख कर
जरुरत पड़ने लगी है अब तो नकाब की
मेरे बयान में खुशबू है, रोशनी है दिल में
मैंने संभाल के रक्खी है परची हिसाब की
मैं भी किनारे लग गया था उस तूफान में
कहानी क्या बताऊँ तुम्हें उस सैलाब की
मुझको आता देख कर मैखाना भी बोला
तुम्हें भी लत लग गई यार अब शराब की
---------सत्येन्द्र गुप्ता

Sunday, January 7, 2018

वक़्त वह मौसम भी कितना सुहाना था
खुशियों ने बुना दिल का ताना बाना था
इश्क पर लिखी थी मैंने भी तो किताब
मेरी आशिकी का भी वो ही जमाना था
सारी मस्ती तेरी उन आँखों की ही थी
मेरे लिए तो जैसे वह ही मैखाना था
याद है अंगडाई लेने की वो अदा तेरी
तेरे पीछे आना तो वह इक बहाना था
जिसमें अपनी सूरत भी अजनबी लगे
तूने मुझे दिया घिसा आईना पुराना था
जिंदगी जाने क्या क्या रंग दिखाती है
लौट कर तूने भी तो वापस जाना था
सुना है आज वह जड़ से ही हिल गया
गिर गया शज़र ही वह जो पुराना था

Friday, December 15, 2017

गमे दिल से ही निजात न मिली
जैसी चाही थी हयात न मिली
इससे बड़ा दर्द और क्या होगा
हमें इश्क की सौग़ात न मिली
इक उम्र तक मनाता रहा उनको
क्या करते हमारी जात न मिली
मुद्दत से तलाश थी हमें जिसकी
किसी सिम्त आबे हयात न मिली
कुछ तो सुकून मिल जाता हमको
कयामत की ही कोई रात न मिली
मौत जब खड़ी हुई दर पर आकर
पल की भी मोहलते हयात न मिली
निजात - छुटकारा
हयात - जिंदगी , सिम्त - तरफ
आबे हयात - जीवन अमृत
नर्म लहजे में प्यार से बात न हुई
मुद्दत से कोई जवान रात न हुई
उम्र तो हमारी भी हो चली अब
मुहब्बत की कभी बरसात न हुई
बादलों में ही छिपा रहा रात भर
नए चाँद से कोई करामात न हुई
इतना मिलते थे हम भी जवानी से
बाद उससे कभी मुलाकात न हुई
अब हर बात मुश्किल सी लगती है
पहले तो इतनी मुश्किलात न हुई
जिंदगी ने भी इतना आजमाया हमें
कभी उनसेभी दिल की बात न हुई

Tuesday, December 5, 2017

यूं क्यों तुझसे हम दूर हुए 
तन्हाइयों  का दस्तूर  हुए।

बेबसी की हद इतनी  थी 
मिलने से भी मज़बूर हुए। 

कईं चाँद सूरज निकले थे 
हम  ही  मगर बे नूर  हुए।

पत्थरों के शहर में रहकर
हम ज़ख़्मों से भी चूर हुए।

बाद मरने के दुआ लगी थी  
तभी तो हम  मशहूर  हुए। 

मुझको मेरा खुदा न मिला 
नाहक ही हम मगरूर हुए। 

साक़ी तेरे मैखाने  में आज 
आकर हम भी मसरूर हुए।
        मसरूर - खुश 
        ------- सत्येंद्र गुप्ता