Tuesday, December 5, 2017

यूं क्यों तुझसे हम दूर हुए 
तन्हाइयों  का दस्तूर  हुए।

बेबसी की हद इतनी  थी 
मिलने से भी मज़बूर हुए। 

कईं चाँद सूरज निकले थे 
हम  ही  मगर बे नूर  हुए।

पत्थरों के शहर में रहकर
हम ज़ख़्मों से भी चूर हुए।

बाद मरने के दुआ लगी थी  
तभी तो हम  मशहूर  हुए। 

मुझको मेरा खुदा न मिला 
नाहक ही हम मगरूर हुए। 

साक़ी तेरे मैखाने  में आज 
आकर हम भी मसरूर हुए।
        मसरूर - खुश 
        ------- सत्येंद्र गुप्ता  

Monday, December 4, 2017

वो शोख़ियां तबस्सुम वो कहकहे न रहे 
मिलने के भी अब तो   सिलसिले न रहे। 

मेरे ख़्याल की दुनिया में तुम मेरे पास थे 
हकीकत में तुम कभी  मेरे बनके न रहे। 

वह चीज़  जिसे हसरत से  देखते थे हम 
हुस्न  फरेब था वह , उसके जलवे न रहे। 

तुमने  जिन ग़मों से  नवाज़ा था  मुझको 
वह बेमिसाल गम भी तो अब मेरे न रहे। 

अज़ब है इस दुनिया  का भी चलन यारों 
ज़रूरत के वक़्त भी तुम कभी मेरे न रहे। 

मेरी उम्मीद मिट गई अगर मिटने भी दो 
वो होली, वो  दिवाली, वो  दशहरे  न रहे। 

मुझे खबर है  ज़िंदगी की आस तुम्ही हो  
अब अपने लख्ते  ज़िगर भी अपने न रहे। 

        -------- सत्येंद्र गुप्ता 
मोहब्बत की तासीर बदल गई 
चाहत  की तदबीर  बदल गई। 

उनको सजा  संवरा देखा जब 
हुस्न की भी  तस्वीर बदल गई। 

आतिशे रुख़्सार की वह सुर्ख़ी 
लगा मेरी भी तो हीर बदल गई। 

अंगड़ाई लेने की  अदा उनकी 
ख्वाहिशों की तहरीर बदल गई। 

रूबरू थी  वो आईने की तरह 
रूठी  हुई  तक़दीर  बदल गई। 

हर तरफ उनका ही चेहरा था 
क़यामत अपना तीर बदल गई 

             -----सत्येंद्र गुप्ता 

Sunday, November 12, 2017

सांप लिपटे देखे जब से आस्तीन पर
यकीन नहीं हुआ हमें अपने यकीन पर
बेखबर हम थे मगर तुम तो वाकिफ़ थे
तुमने यक़ीं कर लिया उस कमीन पर
जलजलों का सिलसिला खत्म न हुआ
संभल कर चलना ज़रा इस जमीन पर
दिल की तमाम हसरतें दिल में रह गई
कैसा कहर बरपा था उस गमगीन पर
जिंदगी अब जाने किस जानिब ले जाए
जाने क्या क्या लिखा है इस जबीन पर
सूखी हुई शाखें अभी तक भी शादाब हैं
कुछ फूल महक रहे हैं बंजर जमीन पर
आज आइना देखने में उनसे चूक हो गई
हर निगाह टिकी थी लिबास महीन पर
जबीन - माथे
शादाब - हरी भरी
कद से बड़ा ख्वाब देख लिया
दिन मे ही माहताब देख लिया
जिंदगी की कमी पूरी हो गई
आज मैंने वो शबाब देख लिया
सवाल करने की हिम्मत न हुई
जब उनका जवाब देख लिया
हाले दिल उनहे सुनाते भी क्या
उनहोंने सारा हिसाब देख लिया
रात ने करवट जरा सी बदली
आखों ने आफताब देख लिया
खाली पीली मुंह कड़वा हो गया
पीकर के मैंने शराब देख लिया

Sunday, July 16, 2017

होशियार का मतलब फनकार नहींं होता
हर हुनरमंद भी तो कलाकार नहींं होता
मिला जो आज मुझको हंसकर बोला वो
हर गली कूचे मेंं भी तो बाजार नहींं होता
एक बार ही उसको जरा गौर से देखा था
अक्सर ऐसा भी तो बार बार नहींं होता
जो दिल मेंं बसा है वह चांद सा लगता है
चांद का भी तो हर रोज दीदार नहींं होता
पुरानी एलबम में एक ही तस्वीर झूठी है
बचपन का वो प्यार क्या प्यार नहींं होता
तेरी नफरत बनी रहे उम्र भर सदा यूं ही
अब हमसे भी इश्क़ का इजहार नही होता
मालूम हुआ है मुझको तुम्हारी ही जुबानी
मैं अपने फैसले पर शर्मसार नही होता
मेरे कमरे का आईना भी नाराज है मुझसे
मैं ऐतबार दिलाऊ उसे ऐतबार नही होता
न ही मंजिल का पता नहीं रस्तों की खबर
ऐसे भी तो सफर पूरा कभी यार नही होता
--------- सत्येंद्र गुप्ता

Monday, May 29, 2017

वह  रंज़ो ग़म  तेरी  बेवफ़ाई का
सिलसिला था वो मेरी तन्हाई का।

तू गया तो लौटके आ न सका था 
क्या सबब बताता मैं  जुदाई का।

तेरे चेहरे पर लिखा पढ़ा था मैंने
मेरा चरचा था न था रुसवाई का।

वही छोड़के चल दिया तन्हा मुझे
दावा किया था मेरी रहनुमाई का।

रात भर दिल में दर्द  उठा था मेरे
गूँज़ता रहा सुर उसी शहनाई का।

आज फिर  दिल  परेशान है बहुत
याद आ रहा है किस्सा सगाई का।

शहरे वफ़ा में दर्द का साथी न कोई
डर आज भी लगता है रुसवाई का।

खुशबु तेरी अब भी मिलती है मुझसे
एहितराम करती है मेरी तन्हाई का।
     
   एहितराम  - इज़्ज़त

         ------सत्येंद्र गुप्ता