Tuesday, August 9, 2016

जाने किस ज़माने की बात करते हैं 
वह  दिल दुखाने की बात करते हैं  !

ज़ख़्म ताज़ा हैं चोट बहुत गहरी है 
वह जशन मनाने की बात करते हैं  !

ज़माखोरी करते हैं  सदा दर्द की 
ख़ज़ाने  लुटाने की  बात  करते हैं  !

ग़ुब्बारे फूलाकर उम्मीदों के वह 
सूइयां  चुभाने की  बात  करते हैं  !

लाश शर्म  सब  वह छोड़ चुके हैं 
निगाहें  लड़ाने की बात  करते हैं  !

लहू कितना  बचा है मुझ में अभी 
मुझको आज़माने की बात करते हैं !

दो बूँद चखी नहीं  जिसने  कभी 
वो पीने पिलाने की बात करते हैं ! 

किसी सूरत से बचपन लौट आये 
हम पतंगें उड़ाने की बात करते हैं  !

           --------  सत्येंद्र गुप्ता 

No comments:

Post a Comment